सभी वेद निन्दक नास्तिक व
असत-पथ-गामी हैं
✍मनमोहन कुमार आर्य
मनुष्य की आत्मा एक अल्पज्ञ
सत्ता है। मनुष्य को बिना पढ़े व सीखे ज्ञान व अज्ञान का भली प्रकार से बोध नहीं होता।
यह संसार परमात्मा के द्वारा बनाया गया है। इसमें जो ज्ञान व विज्ञान है वह परमेश्वर
की देन है। यह ज्ञान व विज्ञान किसी मनुष्य या वैज्ञानिक ने उत्पन्न नहीं किया है।
ज्ञान व विज्ञान का उत्पत्तिकर्ता केवल ईश्वर ही है। ईश्वर के अनेक गुणों में उसका
एक गुण सर्वज्ञ होना भी है। अपनी सर्वज्ञता अर्थात् समस्त गुणों से विभूषित तथा सर्वशक्तिमान
होने से ही वह ज्ञान व विज्ञान का प्रयोग कर इस संसार की रचना करते हैं। हमारे वैज्ञानिक
ज्ञान व विज्ञान के उत्पत्तिकर्ता नहीं अपितु संसार में परमात्मा द्वारा जो ज्ञान व
विज्ञान उत्पन्न किया गया है, उसके द्रष्टा होते हैं। ज्ञान
की उत्पत्ति करने व उसका प्रत्यक्ष करने वाली ईश्वर व मनुष्य यह दोनों पृथक पृथक सत्तायें
हैं। हम अज्ञानतावश दोनों को एक समझ कर बहुत बड़ी भूल करते हैं। संसार में आज तक ऐसा
कोई वैज्ञानिक नहीं हुआ जो यह दावा कर करे कि उसने विज्ञान के जिस नियम व ज्ञान को
पाया है वह उसका उत्पन्न किया हुआ है। उसकी खोज से पूर्व उस ज्ञान का अस्तित्व नहीं
था। अतः मनुष्य को इस बात को यथार्थरूप में समझना चाहिये कि ज्ञान की उत्पत्ति परमात्मा
से हुई है किसी मनुष्य या वैज्ञानिक से नहीं तथा मनुष्य ज्ञान का द्रष्टा व जानने वाला
हो सकता है उसका स्रष्टा कदापि नहीं।
मनुष्य जिस ज्ञान की खोज करता
है वह भौतिक पदार्थों का ज्ञान है। भौतिक पदार्थ मुख्यतः अग्नि, वायु, जल, आकाश और पृथिवी आदि हैं।
इन्हीं की खोज हमारे वैज्ञानिक करते हैं। परमात्मा व आत्मा भौतिक पदार्थ न होकर चेतन,
सूक्ष्म तथा अदृश्य सत्तायें हैं। इनका विज्ञान की रीति से अध्ययन नहीं
किया जा सकता। इनके ज्ञान के लिये हमें वेद, उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, सत्यार्थप्रकाश,
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय एवं आर्य विद्वानों
के वेद विषयक ग्रन्थों का अध्ययन करना आवश्यक होता है। जो इनका अध्ययन करते हैं वह
परमात्मा और आत्मा के सत्यस्वरूप को जानने में समर्थ होते हैं। वैज्ञानिकों व अन्य
सभी मनुष्यों को यदि ईश्वर को जानना है तो अनिवार्यतः इन सद्ग्रन्थों का अध्ययन करना
होगा। बिना इनका अध्ययन किये ईश्वर व आत्मा विषयक यथार्थ ज्ञान नहीं हो सकता। इस समय
देश व संसार में सर्वत्र अविद्या व मिथ्या विश्वास प्रचलित हैं। हमारे पौराणिक बन्धुओं
सहित अन्य मतों व विश्व के लोग वेदों का अध्ययन नहीं करते। अन्य मतों के लोग तो वेदों
की महत्ता को जानबूझकर भी अस्वीकार करते हैं। यदि वह ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें अपने
मत के अस्तित्व के समाप्त होने का खतरा दिखाई देता है। असत्याचरण करने वालों पर सदाचार
की बातों का प्रभाव नहीं होता। कहावत है कि बिना भय के प्रीत नहीं होती।
सत्य सामने आने से असत्याचरण
करने वाले की गलतियां सामने आ जाती हैं। वह लोग येन केन प्रकारेण अपने को निर्दोष सिद्ध
करने के लिये हर प्रकार के उचित व अनुचित साधनों को अपनाते हैं। इस कारण मत-मतान्तरों के लोग अपनी अविद्या व अज्ञान को छिपाने के लिये अपने निकटस्थ मनुष्यों
के सामने वेद व सत्य वैदिक साहित्य को स्वीकार नहीं करते और न ही उन्हें ऐसा करने के
लिये प्रेरित ही करते हैं। वेदों का अध्ययन करने व उनके यथार्थ सत्य अर्थ जानने के
लिये मनुष्यों को सात्विक गुणों को धारण करना होता है। मांस मदिरा का सेवन करने वाले
तथा सुविधाओं से युक्त जीवन जीने वाले व्यक्तियों को वेद की बातें सत्य होते हुए भी
अच्छी नहीं लगती। जब तक वह अपनी बुरी प्रवृत्तियों को नहीं छोड़ते, वह सत्य ज्ञान को प्राप्त नहीं हो सकते। हां, भौतिक ज्ञान
व विज्ञान को वह जान सकते हैं परन्तु ईश्वर को जानकर उसे प्राप्त नहीं हो सकते। यही
कारण है कि हमारे देश के समस्त ऋषि, मुनि, योगी व विद्वान सात्विक गुणों से युक्त शुद्ध शाकाहारी तथा सदाचार से युक्त
रहते आये हैं। आज के समय में स्वामी रामदेव की देश देशान्तर में ख्याति है। वह भी शुद्ध
शाकाहारी, दुग्ध, फल, वनस्पतियों का सेवन करने वाले तथा सदाचार का प्रचार करने वाले व्यक्ति हैं।
यदि वह ऐसा न करें तो उनका योग व अन्य सभी कार्य वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकते।
हमारी इस चर्चा से यह ज्ञात
होता है कि संसार के लोगों को ईश्वर व आत्मा के सत्यस्वरूप का ज्ञान नहीं है। इस दृष्टि
से वह ईश्वर की सत्ता को शाब्दिक रूप में स्वीकार करने पर भी उसके यथार्थ स्वरूप को
न जानने और उसके अयथार्थ स्वरूप को मानने के कारण ऐसे बन्धुओं को पूर्ण आस्तिक नहीं
कहा जा सके। उनका ईश्वर विषयक ज्ञान अधूरा है। वह आत्मा के स्वरूप तथा गुण, कर्म, स्वभाव तथा उसकी अनादि व नित्य सत्ता सहित उसके
बन्धन व मोक्ष विषयक स्थिति को भी नहीं जानते। मनुस्मृति में सृष्टि के आद्य राजा महाराज
मनु ने कहा है कि नास्तिक वह होता है जो वेदों की निन्दा करता है। वेदों की निन्दा
करना यह भी होता है कि वेदों को न मानकर, उनका अध्ययन न कर वेद
विरुद्ध मत-मतान्तरों के अविद्या ग्रन्थों का अध्ययन करना। इस
दृष्टि से संसार के लोग जो वेद के सिद्धान्तों को नहीं जानते, उनको यथार्थरूप में स्वीकार नहीं करते तथा वेदविरुद्ध मतों व मान्यताओं को
मानते व आचरण करते हैं, वह सब भी नास्तिक हैं। नास्तिक होने से
उन्हें अपने कर्तव्य व अकर्तव्यों का भली प्रकार से ज्ञान नहीं होता है। इसके लिये
वह अधिकांशतः अकर्तव्यों का भी सेवन करते हैं।
वर्तमान समय में हम देख रहे
हैं कि लोग देश के अच्छे कानूनों व व्यवस्थाओं का भी साम्प्रदायिक, सत्ता प्राप्ति व स्वार्थों की सिद्धि के लिये विरोध करते कराते हैं। जीवन
बचाने वाले चिकित्सकों के साथ दुव्र्यवहार करते हैं। छूत की बीमारियों को योजनाबद्ध
रूप से फैलाते हैं। स्वास्थ्य परिचारिकाओं पर थूकते और अश्लील हरकते करते हैं। हमारे
सैनिकों, डाक्टरों व पुलिस कर्मियों पर पत्थर बरसाने सहित अन्यान्य
प्रकार से हिंसा करते हैं। यदि यह लोग सच्चे धार्मिक होते तो इस प्रकार का कोई भी अभद्र
काम न करते। ऐसा करना अत्यन्त निन्दनीय है। हमारी व्यवस्था ऐसे लोगों को उचित दण्ड
नहीं दे पाती जिससे इन घटनाओं में वृद्धि होती जाती है। स्थिति यहां तक आ गई है कि
संसार के स्वामी और कर्मों का फल देने वाले परमात्मा का डर पूरी तरह से समाप्त हो गया
है। किसी मत के लोग दूसरे सहिष्णु निहत्थे बेकसूर लोगों को भी संगठित होकर पीट कर मार
देते हैं और दोषियों को दण्डित करने के स्थान पर किन्हीं साजिशों व राजनीति के अन्तर्गत
बचाये जाने के गुपचुप प्रयत्न किये जाते हैं। ऐसा होना मानवता पर कलंक है। इसका कारण
भी यही है लोगों को ईश्वर व आत्मा का यथार्थ ज्ञान नहीं है और लोग ईश्वर के न्याय तथा
जीवों की कर्म-फल-दण्ड व्यवस्था को यथार्थ
रूप में नहीं जानते। यदि लोग सत्य व धर्म को यथार्थ रूप में जान लें तो सभी अपराध समाप्त
हो सकते हैं। इसके लिए सेकुलर शब्द के अनुचित प्रयोग से बचना होगा और सभी स्कूलों में
प्रथम कक्षा से ही वेद व उपनिषद आदि ग्रन्थों की शिक्षा देनी होगी। ऐसा होगा तो इससे
असद् व बुरे काम करने वालों का सुधार होगा और उन्हें दूरगामी लाभ होंगे। वह अपना अगला
जन्म सुधार सकते हैं और दुःखों से बच सकते हैं।
नास्तिक केवल वही लोग नहीं
हैं जो ईश्वर को नहीं मानते। वह तो नास्तिक हैं ही परन्तु नास्तिकों की एक श्रेणी वह
है जो वेद को नहीं मानते और वेदानुकूल आचरण नहीं करते। ऐसे लोग अपने को बहुत बुद्धिमान
समझते हैं। वह सोचते हैं कि वह जो उचित अनुचित तरीकों से धनोपार्जन व अन्य सुविधायें
प्राप्त करते हैं वही वास्तविक जीवन है। यह उनकी अज्ञानता और मूर्खता है। संसार में
परमात्मा का अस्तित्व सत्य व तर्कों से सिद्ध है। उसी का बनाया हुआ यह संसार है। जो
उसके नियमों को तोड़ेगा वह पूर्ण सुखी कभी नहीं हो सकता। उसे कर्मों का दण्ड अवश्य मिलेगा।
संसार में पशु, पक्षी आदि नीच योनियों तथा अस्पतालों में रोगियों
को देखकर ईश्वर की व्यवस्था का ज्ञान होता है। मनुष्य को ईश्वर को मानना चाहिये और
ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानने के वेद और सत्यार्थप्रकाश आदि ऋषियों के ग्रन्थों का
अध्ययन करना चाहिये। ऐसा करते हुए हम दुष्कर्मों व दुराचरण से बचे रहेंगे और हमें इस
जन्म में सुख व शान्ति प्राप्त होने सहित परजन्म में भी सद्गति व उत्तम सुखों को प्राप्ति
होगी। ऋषि दयानन्द ने अपनी सभी मान्यताओं को तर्क व युक्ति के आधार पर प्रस्तुत करने
सहित उनका संसार में प्रयोग करके देखा है। उनके सत्य पाये जाने पर ही उन्हें स्वीकार
किया है। हमें अपने विद्वान आप्त विद्वानों के कथनों पर विश्वास करना चाहिये। स्वयं
अंधविश्वासों से बचना चाहिये और दूसरों को भी बचाना चाहिये। ऐसा करने पर ही समाज तथा
देश का कल्याण होगा। हम कहीं भी कुछ बुरा व अनुचित देखें जो देश व समाज के लिये अहितकर
हो तो हमें उस पर शिष्ट भाषा में अपनी प्रतिक्रिया व विरोध अवश्य ही व्यक्त करना चाहिये
जिससे दूसरों को जानकारी मिले और वह भी सावधान होने सहित बुरी बातों के दुष्प्रभाव
से बच सकें। हमारा कर्तव्य है कि हम नित्य स्वाध्याय की आदत डालें और सत्य को स्वीकार
तथा असत्य का त्याग करें। ईश्वर सत्य एवं यथार्थ सत्ता है। उसे उसके यथार्थ स्वरूप
में स्वीकार करें और वेदविरोधी नास्तिक न बन कर कृतघ्नता के पाप से बचे। ओ३म् शम्।
✍मनमोहन कुमार आर्य
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