साहित्य में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज
करवा रहे कवि एवं उपन्यासकार अजय सिंह राणा आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।
उनका एक काव्य संग्रह ‘उम्मीद के किनारे’ और दो उपन्यास ‘खाली घरौंदे ’ और ‘तेरा
नाम इश्क’ प्रकाशित हो चुके हैं। उनका उपन्यास ‘खाली घरौंदे’ साहित्य अकादमी
चण्डीगढ़ द्वारा श्रेष्ठ पांडुलिपि अवार्ड से नवाजा जा चुका है। दोनों उपन्यासों की
सफलता के बाद अब इनका सद्यः प्र्रकाशित काव्य संग्रह ‘भीगे हुए खत’ पढ़ने को मिला।
इसमें प्रेम के विरह पक्ष की ऐसी अभिव्यक्ति हुई है कि पाठक उसी भावसागर में डूबकी
लगाने लगता है। इस संग्रह की 86 कविताएं और कुछ मुक्तक अन्तर्मन
की उपज है। एक ही विषय पर इतनी कविताएं और कहीं भी
पुनरावृति नहीं ,इसे कवि की काबिलियत ही कहा जाना
चाहिए।
प्रेम समर्पण मांगता है, प्रेम का शरीर से नहीं बल्कि रूह से
संबंध है। और रूह के संबंध को महसूस किया जा सकता है उसे व्यक्त करना असंभव है।
गंूगे के गुड़ खाने जैसा।वैसे भी किसी को पा लेना ही प्रेम नहीं है
बल्कि उसकी यादों को अपने दिल के मंदिर में सजाकर रखना भी प्रेम है।
स्वयं कवि लिखता है -‘प्रेम में कोई मंजिल नही होती बल्कि एक सुन्दर सफर
होता है जिसमें जिस्म का होना मायने नहीं रखता। यह तो रूहों का सफर है जो अन्तिम
श्वास तक निरन्तर चलता है।’
इसीलिए
कहा जा सकता है प्रेम अमर है.... अतीत इसका गवाह है, जो प्राणी प्रेम में आकंठ डूबे रहकर भी
व्यहारिक रूप से एक न हो सके आज भी दुनिया उनको याद करती है।
इन कविताओं का आधार वही विरह है..... विरह में लिखे वे खत आज भी उसे चैन
नहीं लेने देते ....वे यादें पल-पल सताती हैं।
सुनसान, तरे बिन ये रास्ते,
न मंजिल, न उम्मीद, जिएं तो
जिएं किसके वास्ते।
.इसके बावजूद उसका अपने प्रिय के लिए
कहीं द्वेष का भाव नजर नहीं आता बल्कि वह आज. भी उसकी स्मृतियों कोे धरोहर रूप में संजोये
हुए है। इसे प्रेम की पराकाष्ठा ही कही जा सकती है।
ये पत्र
उस प्रेम की कहानी के गवाह हैं।
तेरी यादों के पहाड़ पर बैठकर
मैं शब्दों के बादल छू लेता हूं।
......
..... ...... ......
कर देता मैं रूसवा
तुझे सरे बाजार
पर तुझसे बेपनाह मोहब्बत आज तक है।
प्रेम का संबंध बड़ा गहरा है। इसे बिरले ही समझ पाते हैं। जब प्रेम में
रत्तीभर स्वार्थ न हो....देह का आकर्षण
न हो तो
ऐसे प्रेम में खुदा के दीदार होने लगते हंै। ऐसे में अपने वजूद... अपने अस्तित्व
के होने का पूरा श्रेय अपने साथी को देने लगता है।
मेरी रचनाओं के हर शब्द में
तुम ही तो हो....
इन कविताओं में प्रकृति और उसकी नायिका इतनी घुलमिल-सी गई है पता ही नहीं
चलता कि नायक प्रकृति में नायिका को देख रहा है या
नायिका में प्रकृति को....
गरजते बादल,
गिरती बिजलियां
जाने कैंसी हैं
कुछ तेरे नखरों- सी
कुछ तेरी अदाओं -सी हैं।
प्रकृति जो मन को सुकून देने वाली होती
है सावन में बरसती रिमझिम बरसात देखते ही प्रियतमा की यादें उसकी आंखों से
अश्रुधार बहने पर विवश कर देती है।
ये खत नहीं तेरी यादें हैं ऐ मेरे दोस्त
जिनके सहारे ही तो मैं जी रहा हूं
इन खारे आंसुओं को पी रहा हूं।
इतना होने पर भी प्रेमी आशा का दामन
नहीं छोड़ता। उसे उम्मीद है कि वह आयेगी ...अवश्य आयेगी...
शायद तुम मिलो
और नमी लौट आए इन आंखों में
जो खुशी में डूब जाए
यही सोच खड़ा हूं
उम्मीद के किनारे।
कविताओं के शीर्षक ऐसे लगते है जैसे कविता की आत्मा हो। शीर्षक भी पूरी
कविता-सा आनंद देने लगते हैं। और कविता पढ़ना तो सोने पर सुहागा सा हो जाता है।यदि
इन कविताओं में पाठक को रहस्यवाद की अनुभूति भी होने लगे तो कोई अतिश्योक्ति भी
नहीं होगी ।
इन कविताओं बारे डाॅ अश्वनी शांडिल्य ने खूब लिखा
है-कवि ने इन कविताओं में स्थान -स्थान पर जहां प्रिय की स्मृतियांे के थाल में
वेदना में लिपटे अपने भावों को अर्पित किया है वहीं परार्थ को परमुखता देकर - सीस
भुई धरे’ को भी चरितार्थ किया है।’
कविता में शब्द अपनी ताकत का आभास करवाते हैं...कहीं कोई बोझिल शब्द नहीं
बल्कि तमाम शब्द पानी -से प्रवाहित होते प्रतीत होते हैं। ये कविताएं शब्दों की
कारीगरी नहीं है बल्कि उपमा, रूपक , अनुप्रास आदि अलंकारों एवं सुन्दर
बिम्बों से सजी पाठक को उसी भाव संसार में ले जाती हैं। कहीं कहीं शायरी का आभास
होने लगता है।
ऐ खुदा माफ करना....उसके दीदार की दरकार है मुझे।
कवि का यह काव्य संग्रह अन्य कृतियों की भांति ही साहित्य जगत
में एक अलग पहचान बनाए ऐसी आशा और विश्वास के साथ कवि को बहुत बहुत बधाई।
- राधेश्याम भारतीय
प्रकाशक :नोसन प्रेस चेन्नई तमिलनाडु
मूल्य: 135
नोसन प्रेस,ऐमज़ॉन और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध


2 Comments
ReplyDeleteअजय सिंह राणा की नई किताब " भीगे हुए ख़त" अा चुकी है। अमेज़न पर बुकिंग शुरू हो चुकी है। किताब उनके जीवन अनुभवों और प्यार में डूबे एहसासों से निकली है। अजय जी एक बेहद संवेदनशील लेखक हैं। इनका लिखी किताबें " उम्मीद के किनारे ", " खाली घरौंदे ", तेरा नाम इश्क़" पढ़ते हुए प्यार से भीगे हुए अहसास ज़ेहन में अाकर ऐसे बैठ से जाते हैं और उनकी अमिट छाप फिर जाती नहीं उनका लेखन यह एहसास दिलाता है कि अभी एक उम्मीद हैं प्यार करने वालों से जो नफरत फैलाने वालों को मात दे सकेंगे।
किताब का लिंक यह है। फ़ौरन से पहले ऑर्डर कीजिए
अमेज़ॉन ने ऑर्डर लेना शुरू कर दिया है-https://www.amazon.in/dp/1646785290/ref=cm_sw_r_wa_apa_i_GsGODbS6W1XVW
शुक्रिया दुली चंद जी
ReplyDelete