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| 5 जुलाई को गुरुपूर्णिमा के उपलक्ष्य में विशेष |
गुरुपूर्णिमा आपद्धर्म (वर्तमान में कोरोना महामारी के
काल में ) कैसे मनाएं
विश्व को सनातन धर्म की एक अनमोल देन
है ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ !
संत गुलाबराव महाराज जी से किसी पश्चिमी व्यक्ति ने पूछा, ‘भारत की ऐसी कौन सी विशेषता है, जो न्यूनतम शब्दों में बताई जा सकती है?’ तब महाराज जी ने कहा, ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ । इससे हमें इस परंपरा का महत्त्व समझ में आता है । ऐसी परंपरा के दर्शन करवाने वाला पर्व युग-युग से मनाया जा रहा है, तथा वह है, गुरुपूर्णिमा ! हमारे जीवन में गुरु का क्या स्थान है, गुरुपूर्णिमा हमें इसका स्पष्ट पाठ पढाती है ।
*गुरुका महत्त्व*
गुरु वे हैं, जो
साधना बताते हैं, साधना करवाते हैं एवं आनंद की अनुभूति
प्रदान करते हैं । गुरु का ध्यान शिष्य के भौतिक सुख की ओर नहीं, अपितु केवल उसकी आध्यात्मिक उन्नति पर होता है । गुरु ही शिष्य को साधना
करने के लिए प्रेरित करते हैं, चरण दर चरण साधना करवाते हैं,
साधना में उत्पन्न होनेवाली बाधाओं को दूर करते हैं, साधना में टिकाए रखते हैं एवं पूर्णत्व की ओर ले जाते हैं । गुरु के
संकल्प के बिना इतना बडा एवं कठिन शिवधनुष उठा पाना असंभव है । इसके विपरीत गुरु
की प्राप्ति हो जाए, तो यह कर पाना सुलभ हो जाता है । श्री
गुरुगीता में ‘गुरु’ संज्ञा की उत्पत्ति का वर्णन इस प्रकार किया गया है,
अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः
।। – श्री गुरुगीता
गुरुपूर्णिमा दिन विशेष
आषाढ शुक्ल पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा
एवं व्यासपूर्णिमा कहते हैं । गुरुपूर्णिमा गुरुपूजन का दिन है । गुरुपूर्णिमा का
एक अनोखा महत्त्व भी है । अन्य दिनों की तुलना में इस तिथि पर गुरुतत्त्व सहस्र
गुना कार्यरत रहता है । इसलिए इस दिन किसी भी व्यक्ति द्वारा जो कुछ भी अपनी साधना
के रूपमें किया जाता है, उसका फल भी उसे सहस्र गुना अधिक प्राप्त होता है ।
इस दिन गुरुस्मरण करने पर शीघ्र
आध्यात्मिक उन्नति होने में सहायता होती है । इस दिन गुरु का तारक चैतन्य वायुमंडल
में कार्यरत रहता है । गुरुपूजन करने वाले जीव को इस चैतन्य का लाभ मिलता है ।
गुरुपूर्णिमा को व्यासपूर्णिमा भी कहते हैं, गुरुपूर्णिमा पर
सर्वप्रथम व्यासपूजन किया जाता है । एक वचन है – व्यासोच्छिष्टम् जगत् सर्वम् ।
इसका अर्थ है, विश्व का ऐसा कोई विषय नहीं, जो महर्षि व्यास जी का उच्छिष्ट अथवा जूठन नहीं है अर्थात कोई भी विषय
महर्षि व्यास जी द्वारा अनछुआ नहीं है । महर्षि व्यास जी ने चार वेदों का वर्गीकरण
किया । उन्होंने अठारह पुराण, महाभारत इत्यादि ग्रंथों की
रचना की है । महर्षि व्यास जी के कारण ही समस्त ज्ञान सर्वप्रथम हम तक पहुंच पाया
। इसीलिए महर्षि व्यास जी को ‘आदिगुरु’ कहा जाता है । ऐसी मान्यता है कि उन्हीं से
गुरु-परंपरा आरंभ हुई । आद्य शंकराचार्य जी को भी महर्षि व्यास जी का अवतार मानते
हैं ।
सर्व संप्रदायों
में गुरुपूर्णिमा उत्सव मनाया जाता है । यहां पर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि गुरु
एक तत्त्व हैं । गुरु देह से भले ही भिन्न-भिन्न दिखाई देते हों; परंतु गुरुतत्त्व तो एक ही है । संप्रदायों के साथ ही विविध संगठन तथा
पाठशालाओं में भी गुरुपूर्णिमा महोत्सव श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है ।
*धर्मशास्त्र के अनुसार
गुरुपूर्णिमा मनाने की पद्धति !*
‘5 जुलाई 2020 को व्यासपूर्णिमा अर्थात गुरुपूर्णिमा है । प्रतिवर्ष अनेक लोग एकत्रित होकर अपने-अपने संप्रदाय के अनुसार गुरुपूर्णिमा महोत्सव मनाते हैं; परंतु इस वर्ष कोरोना विषाणु के प्रकोप के कारण हम एकत्रित होकर गुरुपूर्णिमा महोत्सव नहीं मना सकते । यहां महत्त्वपूर्ण सूत्र यह है कि हिन्दू धर्म ने धर्माचरण के शास्त्र में संकटकाल के लिए भी कुछ विकल्प बताए हैं, जिसे ‘आपद्धर्म’ कहा जाता है । आपद्धर्म का अर्थ है ‘आपदि कर्तव्यो धर्मः ।’ अर्थात आपदा के समय आचरण करने आवश्यक धर्म ! वर्तमान कोरोना संकट की पृष्ठभूमि पर देशभर में यातायात बंदी (लॉकडाऊन ) है । इसी अवधि में गुरुपूर्णिमा होने से संपत्काल में बताई गई पद्धति के अनुसार इस वर्ष हम सार्वजनिक रूप से गुरुपूर्णिमा नहीं मना सकेंगे । इस दृष्टि से प्रस्तुत लेख में वर्तमान परिस्थिति में धर्माचरण के रूप में क्या किया जा सकता है, इस पर भी विचार किया गया है । यहां महत्त्वपूर्ण सूत्र यह है कि इससे हिन्दू धर्म ने कितने उच्च स्तर तक जाकर मनुष्य का विचार किया है, यह सीखने को मिलता है । इससे हिन्दू धर्म की विशालता और महानता ध्यान में आती है ।
2. सभी भक्तों ने एक ही समय पूजन किया, तो उससे संगठित शक्ति का लाभ मिलना : संप्रदाय के सभी भक्त पूजन का एक विशिष्ट समय सुनिश्चित कर संभवतः उसी समय अपने-अपने घरों में पूजन करें । ‘एक ही समय पूजन करने से संगठित शक्ति का अधिक लाभ मिलता है । अतः सभी का मत लेकर संभवतः एक ही समय सुनिश्चित कर उस समय पूजन करें ।


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