चीन-भारत संघर्ष के तात्कालिन कारण
✍दुलीचंद कालीरमन
ऐसे समय में जब दुनिया ‘चीनी वायरस’ कोविड-19 से जूझ रही है, मौतों
का आंकड़ा नई ऊंचाइयां छू रहा है, वैश्विक अर्थव्यवस्था मंद
पड़ चुकी है, दुनिया अपने-अपने दायरे में सिमट कर
विश्व-व्यवस्था पर पुनर्विचार कर रही है। ऐसे समय में जब विश्व में चीन के प्रति
नाराज़गी नफरत की हद तक जा चुकी है, तो दुनिया का ध्यान
भटकाने के लिए चीन ने भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
चीन से तनातनी अचानक शुरू नहीं हुई, इसके
स्थानीय और क्षणिक कारण नहीं अपितु वैश्विक कारण हैं। अमेरिका में बढ़ती मौतों का
आंकड़ा देखकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आने वाले राष्ट्रपति चुनाव में
अपनी गिरती प्रतिष्ठा को रोकने के लिए चीन को सबक सिखाने के लिए अपनी रणनीति पर
कार्य करना शुरू कर दिया था। ऑस्ट्रेलिया ने भी भारत के साथ द्विपक्षीय रक्षा सहयोग
संधि की है ताकि हिंद महासागर में चीन की बढ़ती ताकत को रोका जा सके। इस संधि के
तहत ऑस्ट्रेलिया और भारत जरूरत पड़ने पर एक दूसरे के सैन्य ठिकानों का प्रयोग कर
सकेंगे। अमेरिका-जापान-ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच सुरक्षा को लेकर चतुष्कोणीय
समझौता भी विस्तारवादी चीन की घेराबंदी की कोशिश है।
इस बीच अमेरिका ने G-7 का विस्तार G-11
के रूप मे करने तथा इसमे भारत, रूस, दक्षिण कोरिया तथा ऑस्ट्रेलिया को शामिल करने की मंशा जाहिर करके चीन को चेतावनी का कार्य किया है। इससे
जाहिर होता है कि वैश्विक स्तर पर चीन को घेरने के प्रयासों में वैश्विक स्तर पर
चीन को घेरने के प्रयासों में विश्व की नजर भारत पर है। कोरोना के कारण वैश्विक
स्तर पर "मेड इन चाइना" का
बहिष्कार होने लगा तब कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों
को चीन से स्थानांतरित करने का मन बना लिया है। जापान जैसे कुछ देशों ने तो अपनी
कंपनियों को चीन से बाहर जाने के लिए प्रोत्साहन योजना की घोषणा भी की है। विश्व
में बन रहे माहौल तथा कोरोना वायरस को अवसर में बदलने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी ने "आत्मनिर्भर-भारत" पर
कार्य करना शुरू कर दिया है। शीर्ष स्तर पर इससे पहले स्वदेशी की इस भावना को कभी
स्वीकार नहीं किया गया था।
यह सब कुछ इतनी जल्दी-जल्दी हो रहा था कि चीन का
परेशान हो जाना लाज़िमी था। चीन नहीं चाहता था कि उसके पड़ोस में भारत
आर्थिक-सामरिक उन्नति करें। परिणाम स्वरुप उसने भारत के चिर-परिचित पारंपरिक मित्र
नेपाल को भड़काना शुरू कर दिया। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार एक तरह से 'चीन का तोता' बन चुकी है। चीन के उकसावे में आकर
उसने भारत के लिपुलेख, कालापानी तथा लिपीयधुरा को अपने
मानचित्र में दिखाकर नए नक्शे को नेपाली संसद की मंजूरी दिला दी। पाकिस्तान पहले
से ही 'पाक अधिकृत कश्मीर' के छिन जाने
के डर से डरा बैठा था। जब से 'अनुच्छेद-370' हटा तथा 'जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक' आया है। तब से चीन को भी लगने लगा था कि अगर भारत 'पाक
अधिकृत कश्मीर' को वापिस ले लेता है तो उसका "चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे" पर खर्च हुआ
अरबों डालर व्यर्थ हो जाएगा। क्योंकि पाकिस्तान की गुलामी का रास्ता "बीआरआई" पाक अधिकृत कश्मीर से होकर ही जाता है।
चीन यह नहीं चाहता था कि कोरोना के बाद बदली हुई
परिस्थितियों का लाभ भारत को मिले। सारा विश्व जब मई में कोरोना के से लड़ रहा था
तो चीन ने अपने सैनिकों को युद्ध अभ्यास के नाम पर गलवान घाटी में इकट्ठा करना तथा
निर्माण कार्य करना शुरू कर दिया। भारत की 'दौलत बेग ओल्डी'
में बनी रणनीति बढ़त को रोकने के लिए निरंतर प्रयास कर रहा है। 15
जून के खूनी संघर्ष की घटना भी चीन की इसी रणनीति का अंग है। चीन
भारत को दुनिया भर में निवेशकों तथा चीन से आने वाली कंपनियों की नजर में अस्थिर
तथा युद्ध का भय दिखाना चाहता है ताकि कोरोना का यह संक्रमण काल गुजर जाए और भारत
इस मौके का फायदा ना उठा सके।
चीन विश्व में कई मोर्चों पर एक साथ लड़ाई लड़ रहा
है। अपने सस्ते माल के कारण वह अमेरिका जैसी कई अर्थव्यवस्थाओं को पंगु बना चुका
है। जिसमें उन देशों में बेरोजगारी की दर उच्चतम स्तर तक जा चुकी है तथा स्थानीय
जनता में आक्रोश कई अन्य रूपों में फूट रहा है। चीन की लड़ाई का एक अन्य पहलू उसकी
कर्जदार बनाने की नीति है। जिसमें वह विश्व के कई छोटे देशों को अपने जाल में
फंसाकर उसके संसाधनों पर कब्जा कर चुका है। वहां की सरकारें भी चीनी तोता बन चुकी
हैं। भारत के कई पड़ोसी देश इस श्रेणी में आते हैं।
चीन का नया हथियार उसका सांस्कृतिक हमला है। जिसके
माध्यम से वह पाकिस्तान, नेपाल जैसे देशों को चीनी भाषा
पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है। नेपाल तथा पाकिस्तान की सरकारें भी खुश हैं
क्योंकि चीनी भाषा पढ़ाने वाले अध्यापकों को वेतन चीन देता है। एक कम्युनिस्ट देश चीन से वेतन भोगी अध्यापक पाकिस्तान और नेपाल के बच्चों
को चीनी भाषा के माध्यम से कौन सी विचारधारा पढ़ाएंगे, यह
अंदाजा लगाना कठिन नहीं है।
भारत इन सब चुनौतियों का सामना डटकर कर रहा है।
स्वदेशी व 'आत्मनिर्भर भारत' की भावना
सिर्फ क्षणिक न होकर सरकार की नीतियों में स्पष्ट नजर आनी चाहिए। सरकार द्वारा 20
लाख करोड़ के राहत पैकेज में इसकी कुछ झलक दिखाई भी देती है। देश के
स्वाभिमान तथा विश्व की सबसे युवा आबादी को रोजगार तथा स्वाभिमान की राह स्वदेशी
से ही आसान होगी। चीन की चालबाजियों को कड़ा और विवेकपूर्ण जवाब देकर ही भारत
विश्व में अपनी अलग पहचान बना सकता है।
✍दुलीचंद कालीरमन
118/22, कर्ण विहार
करनाल (हरियाणा)
9468409948
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