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| आत्मनिर्भर निर्भर भारत का संकल्प - स्वदेशी ही विकल्प |
✍डॉ कुंदन कुमार
कोविड 19 के समस्या के बीच मे
पूरी दुनिया ने यह अनुभव किया कि है ऐसी समस्या बार बार विश्व पटल पर आ सकती है
अगर पूरी दुनिया ने अपने खान पान और अर्थ आधारित विकास के तरीक़े में बड़े स्तर पर
बदलाब ना किया।क्योकि दुनियाभर में आज तक जितनी भी महामारी जैसी समस्या आयी है
सबके पीछे एक कि कारण रहा है वो है अधोगिकरण यानी अर्थ आधारित विकास इसके जरिए
किसी भी जानवर को खाकर मानव के शरीर मे प्रोटीन की जरूरतों को पूरा करने की वकालत
होती है।आज सम्पूर्ण विश्व, मानव को खाने के लिए जानवरों पर
तेजी से बढ़ती निर्भरता से चिंतित हो रहा है और विकल्प के लिय भारत की ओर टकटकी
लगाए बैठा है। इसका कारण यह भी है जानबर में स्वाभिक रूप से पाए जाने वाले जीवाणु ,विषाणु का मानव में आने का खतरा बढ़ जाता है।
जब जानबर से कोई जीवाणु या विषाणु मानव
जाति में प्रवेश करते है तो वह बहुत की खतरनाक साबित हुई है। उदाहरण स्वरूप स्वाइन
फ्लू ,बर्ड फ्लू,स्पेनिश फ्लू, इन्फ्लूएंजा, HIV, ईबोला,सार्स,कोविड आदि ना जाने कितनी जानलेवा विमारी ज़ूनोटिक प्रकृति की थी जो मानव के
जीवन मे साक्षात काल के रूप में आई। इन सभी समस्याओं के बीच वही देश और समाज कम
दिक्कतो को अनुभव कर पाए जिनके पास खुद के खाने के उत्पादन में आत्मनिर्भर थे
क्योंकि इस परिस्थिति में बिश्व के लगभग सभी देशों में लॉक डाउन करना पड़ा और अब
सम्पूर्ण विश्व इस निष्कर्ष पर ही कि कुछ दिन तो कोविड के साथ जीने की आदत डालनी
होगी।लॉक डाउन के दौरान सबसे जरूरी तीन चीज़ों का अनुभव दुनिया के साथ साथ अपने देश
ने भी किया जिसमे आदमी आधारित स्थानीय रोजगार, भोजन और
चिकित्सा की सुविधा रही है।अभी अपने देश मे भोजन का पर्याप्त भंडारण है और दुनिया
मे सस्ती दवा उत्पादन में भी अपना देश अग्रणी है किंतु क्या सही मायने में हम इस
दो वस्तुओ में आत्मनिर्भर है?
भोजन के लिए लंबे समय आत्मनिर्भर रहने
के लिय सबसे प्रमुख जरूरत खेती का सुचारू रूप से होना है।हमारे देश मे खेती के लिय
सबसे जरूरी चीज़ों में रासायनिक खाद,उन्नत बीज और कीटनाशक
दवाईओ का उपयोग होता है।वर्ष 2017-18 में 42.17 लाख टन DAP,4.99 लाख टन NPK और
47.36 लाख टन MOP का आयात विभिन्न
देशों से किया गया।इसके साथ साथ औसत तीन वर्षों में 63.12 लाख
टन यूरिया का आयात भी सरकार के द्वारा किया गया अगर सिर्फ यूरिया के आयात का
मूल्यांकन करे तो वो लगभग 1295.75 मिलियन डॉलर यानि सिर्फ
यूरिया का आयात 12797.31 करोड़ का रहा था DAP आयात में हम दुनिया मे सबसे ऊपर के पायदान पर है।मतलब कृषि में लगने वाली
रासायनिक खादों में हम कही ना कही दुसरे देशों पर निर्भर है।
अब बात बीज की करते है बीज में हम बहुत
कुछ निर्यात भी करते है किंतु वर्ष 2017-18 में 16051.46
टन से बढ़ कर वर्ष 2018- 19 में सिर्फ सब्जी और
फल के बीज का आयात 19725.77 टन हो गया जिसकी वैल्यू 119.77 मिलियन डॉलर थी।इसी प्रकार
कीटनाशको का आयात भी हर वर्ष बढ़ता ही जा रहा है।आयात बढ़ाने से भी ज्यादा चिंता का
विषय प्रति हेक्टेयर कीटनाशक के उपयोग का बढ़ना है जो कही ना कही भविष्य में खतरे
की निशानी है।दवा के एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट्स(API) के लिए भी हम दूसरे देशों पर पूर्ण रूपेन निर्भर है यहां तो स्थिति और भी भयावह
है कुल उपयोग का करीब 97% एपीआई हम दूसरे देशों से मंगाते है
जिसमे चीन प्रमुख है।अपना पूरा देश नेट अगर देखा जाए तो कृषि उत्पादन के लिए भी
आयात पर निर्भर है। इस स्थिति में संयुक्त राष्ट्र संघ की चेतावनी की दुनिया मे
खाद्य संकट हो सकता है को हमे गंभीरता से लेना चाहिए। इस तरह की स्थिति में दूसरे
देशों से खाद्य सामग्रियों को आयात करना भी जोखिम भरा रहता है जिसमे खाद्य
गुणवत्ता, समय से उपलब्धता और कई अन्य प्रकार की आर्थिक
बाध्यता रहती है।
हमे अपनी सभ्यता संस्कृति में बताये मार्गो पर
चलना होगा जिसमें अन्न ही जीवन है अन्न ही ईश्वर है का बोध रहता है।हमे अन्न के
बर्बादी को बिल्कुल रोकना होगा,किस अन्न का अधिक उत्पादन करना है
उंसके लिए समय रहते प्लानिंग करनी होगी।कई राज्य और लोग टूरिस्म व्यवसाय पर निर्भर
थे उन्हें भी इसी क्षेत्र में कुछ विकल्प देना होगा उंसके लिए भी कुछ अवसर स्वदेशी
विकल्पों से संभव है।अभी की स्थिति में हमारे भोजन की थाली और इलाज भी दूसरे देशों
के दया की मोहताज बन जाएगी इससे निपटने के लिय हमे वैकल्पिक व्यवस्था को जल्द से
जल्द तलाशना होगा, युवाओं को साथ
लेना होगा और वैकल्पिक कृषि में अनुसंधान पर जोड़ देना
होगा क्योंकि ऑर्गनिक फार्मिंग भी कुछ इसी तरह हमारे भोजन को दूसरे देशों पर
निर्भर करती हुई प्रतीत हो रही है।हम जैविक खेती के इनपुट के लिय भी दूसरे देशों
पर निर्भरता बढ़ाते जा रहे है।इसमे भी हमे अपने बिकल्प तलाशने होंगे युवाओं को
रोजगार के लिए आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रेरित करना होगा। इससे ही समाधान
निकलने वाला है।
हमे स्वदेशी के मार्गो पर चलना होगा और किसान को
खुद खेत के उपयोग के लिए,गाय के गोबर,घर के कचरा,जैविक खाद,बीज और किट निवारण की वव्यवथा बनाने को
प्रेरित करना होगा। अपने युवाओं को व्यवसाय के क्षेत्र में जाने के लिए प्रेरित
करना होगा, सुविधा संसाधन से सम्पन्न बनाना होगा,अनुसंधान संस्थाओं को युवाओं से सीधा जोड़ना होगा और पारदर्शीता लाना
होगा।अपने जरूरतों को उन्हें बताना होगा और समाधान खोजने पर प्रोप्तसाहित करना
होगा जिससे ये आयात के बदले निर्यात करने में सक्षम हो सके नही तो हम आगे के आने
वाली चुनौतीओ में खुद को फसा अनुभव करेंगे और बिपत्ति में भोजन के लिय भी किसी और
देशों पर निर्भर होना पड़ेगा! समय के साथ अपने लोकल के लिय वोकल होना पड़ेगा बाजार
जाने पर स्वदेशी समान को प्राथमिकता देना होगा, स्वदेशी समान
में अच्छाई को उजागर करना पड़ेगा। जय स्वदेशी जय जय स्वदेशी ।
✍डॉ कुंदन कुमार
शिक्षा - पीएचडी (बायोटेक्नोलॉजी) एमबीए, एग्रीकल्चर पालिसी में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा। वर्तमान में सोशल एंटरप्रेन्योरशिप दिल्ली में कार्यरत। 12 साल का रिसर्च तथा अन्य फील्ड में व्यतिगत अनुभव।



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