सज गयी मधुशाला
✍विनोद निराश, देहरादून
सूने गुरुद्वारे, सूना
शिवाला,
सूनी पड़ी हर सू
पाठशाला।
कर के बन्द
मंदिर-मस्जिद ,
वो खोल बैठे लो
मधुशाला।
खुश होकर घूम रहा आज
,
सूनी सड़कों पर
मतवाला।
गले लगाकर मिल रहे
सब ,
मुद्दत बाद मिला
पीनेवाला।
भूल गए राशन की लाइन,
देखी कतार दरे -
मधुशाला।
राजस्व की याद उसे
ही आई,
राशन लाया जो लूंगी
वाला।
क्या करेगा कोरोना
उसका ,
हाथ में जिसके हो
मधुहाला।
अर्थ व्यवस्था की
व्यवस्था में ,
सज गयी फिर से मधुबाला।
घर में बैठे-बिठाये
लोगों को ,
राह दिखा रही संध्याबाला।
द्वार खुला आओ पीने
वालों ,
कब से खाली बैठी
साकीबाला।
दुःख-दर्द, थकान
मिटा अपनी ,
थाम हाथ में हाला का
प्याला।
पी के भूल जाएगा सब
कुछ ,
मस्जिद हो, या
हो शिवाला।
क्या सोचे आके
मयखाने में,
बुझा दिल में लगी ज्वाला।
पी जब तक है, जिस्म-ओ-जां,
तेरे बाद रोयेगा, रोने
वाला।
मौत बंट रही जब
बाजारों में,
करेगा क्या, निराश
रखवाला।
लघु परिचय
✍ विनोद निराश
पुत्र = श्री
ओमप्रकाश
पता - ए -114 , नेहरू कॉलोनी , देहरादून , उत्तराखण्ड
शिक्षा -
स्नातकोत्तर
सम्प्रति-पत्रकारिता
रूचि -लेखन
विधा- ग़ज़ल , कविता
, लघुकथा , मुक्तक , कहानी आदि।
दूरभाष = 09719282989


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