विज्ञान के लिए चुनौती बना कोरोना
✍देवानंद राय
आज पूरा विश्व कोरोना के कहर से कराह
रहा है। दुनिया के बड़े विकसित देशों से लेकर छोटे विकासशील देश भी इस अत्यंत छोटे
वायरस, जो बिना माइक्रोस्कोप के दिखता नहीं उसके सामने घुटने टेक
रहे हैं। चीन के वुहान प्रांत से फैला यह वायरस आज समूचे मानव जाति के अस्तित्व के
लिए खतरा बन चुका है। दुख की बात तो यह है कि इस खतरनाक वायरस से निपटने के लिए
हमारे पास ना तो कोई खास वैक्सीन है और ना कोई सटीक दवा। सिर्फ सोशल डिस्टेंसिंग
और लॉकडाउन जैसी कठोर पर जरूरी उपाय अपनाकर आज पूरा विश्व का हर देश खुद को
सुरक्षित करने में लगा हुआ है।
आज विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे सबसे बड़ी
वैश्विक संस्था ने जब इसे वैश्विक महामारी घोषित कर दिया है तो यह आधुनिक चिकित्सा
विज्ञान सहित कई अन्य प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों और विज्ञान के अनुसंधान
क्षेत्रों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। आज भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश
में रोगियों की संख्या हर दिन बढ़ रही है तो वहीं अमेरिका और इटली जैसे विश्व
स्तरीय चिकित्सा सुविधा देने वाले भी इससे कोई हल नहीं निकाल पा रहे हैं। इन
हालातों में यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि क्या सिर्फ इन बचाव के उपायों से
कुछ हद तक कोरोना वायरस से बचे रहें और लोगों को इस रोग के कारण काल के गाल में
समाते देखते रहे या फिर मानव अपनी स्वाभाविक गुण को जागृत कर इस रोग के इलाज ढूंढे।
अभी लगभग हर देश में इसके लिए रिसर्च चल रहे हैं। परंतु कोई ठोस परिणाम निकल करना
बड़ा निराशाजनक है। विज्ञान के अनुसार दुनिया में से वायरस से निपटने के लिए
औषधियों की भारी कमी है। जिन वायरसों में उनका जेनेटिक मैटेरियल डीएनए ना होकर
आरएनए होता है। इस कारण ऐसे वायरसों को रेट्रोवायरस के नाम से जाना जाता है।
अगर हम थोड़ा पीछे चले तो हमें पता चलता है कि
पिछले वर्ष दिसंबर 2019 में चीन के वुहान शहर में निमोनिया के रोगियों की
संख्या अचानक से बढ़ गई। लंबी जांच के बाद में पता चला कि यह एक वायरस से होने
वाली बीमारी है और यह वायरस पहले कभी देखा नहीं गया। अब यह जान ले कि इस वायरस का
नाम कोरोना क्यों रखा गया? जैसा कि हम जानते हैं कि किसी भी
वायरस में एक मध्य भाग होता है इस बीच वाले भाग को में उसका जेनेटिक मैटेरियल भरा
होता है। एक बाहरी भाग होता है, जिसे बाहरी कवच एनुअल कहते
हैं। कोरोनावायरस का बाहरी खोल मुकुट (क्राउन)जैसा दिखता है और क्राउन को लैटिन
भाषा में कोरोना कहा जाता है। इसलिए इसका नाम कोरोना पड़ा। हालांकि इसका आधिकारिक
नाम कोविड-19 है। जिसका अर्थ जिसमें को का अर्थ कोरोना वि का
अर्थ वायरस और डी का अर्थ डिजीज है और 19 का अर्थ की पहचान 31
दिसंबर 2019 को हुई थी।
यह एक उचित पहल थी ताकि दुनिया के के
लिए विनाश का कारण बन चुके इस वायरस को लेकर रिसर्चकर्ताओं में किसी प्रकार का
भ्रम ना हो और संगठित होकर इस रोग के निदान के तरीके ढूंढें। ऑस्ट्रेलिया, चीन, फ्रांस और अमेरिका के कई संस्थान तथा कंपनी वायरस का टीका विकसित करने
में जुटे हैं। पूरी दुनिया प्रयोग कर्ताओं की ओर आशा भरी नजरों से देख रही है कि
कब एक सटीक वैक्सीन की घोषणा करें। परंतु स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हो सकी है कि
वैक्सीन कब तक उपलब्ध होगा। इस समय दुनिया में करीब बीस वैक्सीन बनाने का काम चल
रहा है। जिसमें कुछ वैक्सीन का ट्रायल इंसानों पर शुरू हो चुका है, तो कुछ जानवरों पर टेस्टिंग जारी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वैक्सीन
आने में अभी वक्त लग सकता है। दूसरी बात यह भी है कि वैक्सीन बन भी गया तो इसके
उत्पादन से लेकर रोगियों तक पहुंचने में भी काफी समय लग सकता है। क्योंकि दुनिया
के एक दो नहीं करीब 140 देश इस वायरस के चपेट में है।
इन विषम परिस्थितियों में कुछ खबरें राहत भी दे
रही है। वह यह है कि यह वायरस अपना जेनेटिक स्ट्रक्चर को तेजी से नहीं बदल रहा है।
क्योंकि कई बार वायरस जलवायु परिवर्तन के कारण भिन्न-भिन्न देशों तथा दशाओं में
खुद के भीतर परिवर्तन लाने लगता है जिससे हर देश के लिए उसके जलवायु के अनुरूप
वैक्सीन बनाना पड़ता है। परंतु कोरोना के साथ ऐसा ना होने के कारण अगर दुनिया में
कहीं भी एक सटीक वैक्सीन की खोज होती है तो उससे पूरे दुनिया आसानी से प्रयोग किया
जा सकता है। विज्ञान की एक पत्रिका “द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन” में
प्रकाशित एक रिपोर्ट इन दिनों दुनिया ध्यान खींच रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक
अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में इलाज के लिए एंटीवायरल दवा रेमडेसिविर का इस्तेमाल
किया गया और वह व्यक्ति स्वस्थ हो गया। रेमडेसिविर इबोला के लिए बनाई गई एक दवा है।
इबोला जो एक महामारी वाला रोग था जो वर्ष 2014 में फैला था। जिसने
पश्चिमी अफ्रीका देश गिनी जहां से फैला लियोन, नाइजीरिया में
खूब कहर ढाया था। रेमडेसिविर दवा को अभी भी पूरी तरीके से कोरोने के लिए मंजूरी
नहीं दी गई है।
इसी तरह भारत में प्रयोग की गई हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वनीन
जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने कोरोना की लड़ाई का गेम चेंजर बता दिया। यह
दवा कोरोना वायरस का पूरी तरह इलाज नहीं करती पर उसके प्रभाव
को काफी कम कर देती है। यानी हाई स्तर पर पहुंचने से पहले यह दवा दी जाती है तो यह
दवा फेफड़ों की कोशिकाओं पर काम करता है। जिससे संक्रमण बढ़ नहीं पाता और रोगी
गंभीर स्थिति तक पहुंचने से बच जाता है। यहां यह बात जानना जरूरी है कि यह दवा कोई
वैक्सीन नहीं है और ना ही इससे कोई पूरी तरह ठीक हो सकता है। यह सिर्फ मरीज को
राहत देते हुए उसके प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है। जिससे उसका शरीर खुद को
रोना से लड़ने के लिए तैयार हो जाता है। इन सब से स्पष्ट है कि कोरोना से लड़ाई की
जंग में हम अभी पीछे हैं। यह विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती है। उम्मीद है कि
विज्ञान इस चुनौती को स्वीकार कर चुका होगा और अपने पूरे ज्ञान प्रतिभा और क्षमता
के बल पर इस चुनौती के पार पा जाएगा।
✍देवानंद राय
गोरखपुर(उ.प्र.)



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